हाँग काँग में हिन्दी में बात कर उसने मुझे चौंका दिया

मेरी फ्लाइट जब हाँग काँग एयरपोर्ट पर लैंड की तो उस समय 1 बजे के आस पास का समय हो रहा था. उतरने के बाद हम इमीग्रेशन क्लियर करने के लाइन में लग गये. नॉर्मली एक एक कर के ही हर इंसान को इमिग्रेशन काउंटर पर जाना होता है लेकिन यदि आप एक स्मॉल फ़ैमिली हैं और साथ में एक छोटा बच्चा है तो इमिग्रेशन वाले आप सब को एक बार में काउंटर पर आने देते हैं.

तो हमारी बारी आपने पर हम तीनों (मैं, मेरी पत्नी, और मेरी बेटी)  वहाँ एक साथ चले गये. वहाँ उन्होंने मेरे पेपर्स और मेरी पत्नी के पेपर्स तो आराम से क्लियर कर दिये लेकिन वो लोग पता नहीं क्यों मेरी बेटी जो उस समय सिर्फ़ 3 वर्ष की थी के पेपर्स को देख कर कुछ अजीब से एक्सप्रेशन दे रहे थे. जो आदमी काउंटर पर था उसने यशिका (मेरी बेटी) के पेपर्स को किसी और को भी दिखाया और उससे कुछ बात की, अब वो लोग क्या बात कर रहे थे ये तो मेरे पल्ले नहीं पड़ा क्योंकि वो चाइनीज़ में बात कर रहे थे लेकिन उनके चेहरों के हाव भाव देख कर मुझे लग रहा था की कुछ गड़बड़ है.

हम दोनों को टेंशन होने लगी की ये क्या हुआ. बहुत देर तक जब वो लोग सिर्फ़ पेपर्स पर बात करते रहे और ना तो मुझे कुछ बोला ना पेपर्स को क्लियर या रिजेक्ट कर रहे थे तो मैंने फाइनली उनसे पूछ लिया क्या को समस्या है पेपर्स में? लेकिन उन्होंने मना कर दिया और दोनों ऑफ़िसर्स ने आपस में कुछ और बातें की और पेपर्स को क्लियर कर दिया बिना कुछ बोले. तब हमारे जान में जान आई. और हमलोग वहाँ से टैक्सी स्टैंड की तरफ़ बढ़ गये.

यहाँ की टैक्सी में बैठने का एक बड़ा अलग सा अनुभव रहा. लेकिन ये पोस्ट किसी और बारे में है तो टैक्सी के अनुभव के बारे में कभी और बात करेंगे. 

हाँ तो मैं कह रहा था की हमें इमिग्रेशन में बहुत टाइम लगा गया और क्योंकि हमारा होटल शहर से थोड़ा दूर था तो इसकी वजह से भी हम थोड़ा और लेट हो गये.

  वहाँ पहुँच कर हमने बस थोड़ा सा आराम  किया और जल्दी से तैयार हो कर निकल गये. क्योंकि आज ही हमें विक्टोरिया पीक देखने जाना था. इसकी बुकिंग हमने KLOOK से करवाई थी. और उन्होंने जो इंस्ट्रक्शन हमें भेजी थी उसके हिसाब से हमें प्रिंस बिल्डिंग  के पास एग्जिट K के पास klook के एजेंट से 5:30 PM तक मिलना था.  

टैक्सी ने हमें प्रिंस बिल्डिंग पर छोड़ दिया. जब हमने बिल्डिंग देखी तो समझ में आ गया की एग्जिट K खोजना आसान नहीं होगा. 

ख़ैर अब किया क्या जा सकता था. हम लोग अंदर गये. ये एक बहुत बड़ा मॉल था. हमने अंदर मैप खोजने की कोशिश की लेकिन मुझे ऐसा कुछ नहीं मिला. अब हमलोग परेशान होने लगे थे. क्योंकि हमलोग बहुत लेट हो चुके थे. 

जब कुछ भी समझ में नहीं आया की क्या किया जाये तो अंत में मैंने किसी आदमी से पूछने का तय किया लेकिन यहाँ पूछा कैसे जाये. ये तो चाइना है और बहुत कम लोग यहाँ इंगलिश बोलते हैं. सामान्य चाइनीज़ लोग इंगलिश कम या नहीं समझते हैं. और क्योंकि मुझे मॉल के किसी स्टाफ से रास्ता पूछना था तो उसके तो इंगलिश समझने का चांस और भी कम था. लेकिन हम लोगों की चाइनीज़ नहीं आती थी तो हमें इंगलिश में ही पूछना था. केआर मैंने देखा एक गार्ड थोड़ी दूरी पर खड़ा है तो मैंने उसे से पूछने का सोचा. 

उसके पास गया और इंगलिश में बोला excuse me, can you tell me where is exit K, (क्या आप हमें exit K का रास्ता बता सकते हैं). 

उसने मुझे उत्तर देने की बजे मुझसे पूछा हिन्दी समझते हो? 

अबे ये क्या हो गया. हाँग काँग में एक चाइनीज़ मुझसे हिन्दी में पूछ रहा है हिन्दी समझते हो.

मैंने शॉक्ड होकर बोला हाँ लेकिन आप?

तब उसने बताया मैं नेपाल से हूँ और यहाँ गार्ड का काम करता हूँ. और बहुत समय तक भारत में रह चुका है. तब मेरी समझ में आया की ऐसा शॉक मेरे को कैसे लगा. 

लेकिन उसे भी एग्जिट K का पता नहीं था तो उसने किसी और से पूछा और हमें हमारी मंज़िल तक ख़ुद से पहुँचा कर ही हमें छोड़ा. जब हमें एग्जिट K मिल गया तो हमने उसे धन्यवाद दिया और अपनी एजेंट के पास चले गये.

विक्टोरिया पीक घूमने का अनुभव बहुत अच्छा था लेकिन वो एक अलग एक्सपीरियंस था इसलिए उसके बारे में डोरे पोस्ट में. 

फ़िलहाल के लिए बाय बाय 

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